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आरजू की राह से आस्तित्व के पथ पर आई : रुचि तिवारी

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तमन्नाओ ने मुझे किस राह पर लाया, मैं कभी तकाजा ही नही लगा पाया, पूंछा जो खुद से मैने खुद की रजा, पहला ही अक्षर ‘अ’ से “आस्तित्व” आया..।

आरजू की राह से जो आस्तित्व के पथ पर आई, खुद को मैं अकेला न पाई। थी एक बहुत बड़ी भीड़, जिसमे हर कोई ढूढं रहा था अपनी रीढ़। एक पिता मिले उस राह में, लीन थे जो अंतर्मन की आह में। बेबसी और लाचारी टपक रही थी चेहरे से, क्योंकि नकाबिल थे वो अपनी नजरो में। बेबाकी से मैने पूंछ ही लिया, आप कैसे और क्यों इस राह में भला। नाकामयाब थे बेटे की फरियाद में, सो अपने वजूद को तलाशने में चला।

आगे जो चंद कदम मैं बढ़ाई, जाकर एक बूढ़ी माँ से टकराई। देख उनकी हालत, आंखे मेरी भर आईं। इस उम्र में अपने बेटे को वो कैसे न सुहाई। दूर कुछ कदम एक बेटा था खड़ा, बेबसी की सीमा तक था चढ़ चुका। घर वालो पर बोझ था वो बना, घर का बेटा होकर भी ज़िम्मेदारी न बांट सका।

आंखे पोंछ मैं आगे बढ़ रही थी, मुसलसल सबसे मिलते चल रही थी। एक पीड़ित लड़की किनारे रो रही थी, अपने आस्तित्व को जो कोश रही थी। सितमगिरी को सह रही थी, खुद से ही कितना कुछ कह रही थी।

कदमो का सिलसिला फिर बढ़ा, जाकर नदी के तट पर रुका। ज्यो ही मुँह धुलने को हाथ था बढ़ा, मैने खुद को तुरंत पकड़ा। उस इठलाती नदी में अब वो बात नही रही, अपनी हस्ती से कही वो खो रही। चाहा मैने जानना वजह उसकी बदहाली की, बोली मै अपना वजूद ही गंवा चुकी। न मुझमे अब कल-कल का स्वर है, और न ही वो इठलाती धार।सूख चुकी मैं इस कदर कि, एक लंबे नाले जैसा हुआ हाल। दौड़ी भागी में बिना एक पल गवाए, खडे थे वो कटे हुए पेड़ अपनी जड़ जमाए। सूखी शाखों से मुझसे कहलवाए, तुम इंसानों को हर पत्ते क्यों न भाए।

जम गये ऐसे पैर मेरे, होंठो पर सिकुडन आई। खुद के आस्तित्व को सब तलाश रहे, प्रकृति की सुध कैसे न आई। एक वीरान सा महल है, सब लड़ रहे अपने वजूद की लड़ाई। ये एक ऐसी कश्मकश है, कि जुदा हो रहे है अब भाई-भाई…..!!!

।लेखिका :- रुचि तिवारी।