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विशेष : जाने बच्चों में लिंग असमानता के कारण व प्रभाव : आयुषी गोस्वामी

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भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनीतिक परिवेश में जिस नारी को “शक्ति” बता कर संबोधित किया जाता है, उसकी शक्तियों को गर्भ में ही खत्म कर दिया जाता है। जिन लड़कियों को अप्रत्याशित रूप से जन्म दिया भी जाता है, उन्हें पितृसत्तात्मक सोच को स्वीकार करके अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता है। जहां लड़कों के जन्म पर घरों में जश्न मनाया जाता है, वहीं लड़कियों के जन्म पर आज भी लोगों को निराशा होती है। बचपन से ही लिंग असमानता के कारण बच्चों के साथ क्या भेदभाव होता है, और उनकी मनोवैज्ञानिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है, तो आइए आपको बताते है नीचे दिए गए कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं से

कार्टून व फिल्मों के द्वारा भेदभाव

जिस तरह से वर्षों से बॉलीवुड में फिल्मों और कार्टून का चित्रण किया जाता है, उससे बचपन में ही लड़कों एवं लड़कियों के सामाजिक कर्म उनके दिमाग में बैठा दिए जाते हैं।अगर किसी कार्टून में लड़कियों को शक्तिशाली दिखाया भी जाता है, तो यह सत्य स्वीकारने में बच्चों को कठिनाई होती है। उदाहरण के तौर पर ‘छोटा भीम’ कार्टून में भीम को एक शक्तिशाली नायक प्रस्तुत किया गया है, तो वहीं चुटकी को सहमा और डरा किरदार दिखाया गया है।

खेलों द्वारा होता है भेदभाव-

सामाजिक रूढ़िवादी सोच के आधार पर, छोटी बच्चियों को नाज़ुक बताकर, उन्हें बचपन से ही हल्के-फुल्के खेलों में आगे बढ़ाया जाता है। यदि कुश्ती, मुक्केबाजी एवं कबड्डी जैसे खेलों में लड़कियां कदम बढ़ाने की कोशिश करती भी हैं तो उन्हें अभिभावक और शिक्षकों के दकियानूसी विचारों का शिकार होना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर यदि लड़के गुड्डे-गुड़ियों, किचन सेट व अन्य घरेलू खेलों को खेलना पसंद करते हैं तो उन्हें आंतरिक जटिलता महसूस करनी पड़ती है। उदाहरण के तौर पर कुछ साल पहले तक बच्चों के लिए “किंडर जॉय” नाम से समान पैकेट आता था जिसे अब लिंग में विभाजित कर दिया गया है। ऐसे में बचपन से ही बच्चों में लैंगिक रूढ़ीवादी छवि तैयार की जा रही है जो भविष्य में हानिकारक साबित हो सकती है।

वंशवाद एवं घरेलू वातावरण-

हमारे पूर्वजों के अनुसार अपने वंश बढ़ाने हेतु घर में लड़का होना आवश्यक है जो घर का सहारा बन सके और मृत्यु के बाद उन्हें कंधा दे सके। यह विचारधारा आज बच्चों के लिए भी सामान्य हो चुकी है। साथ ही साथ छोटी-मोटी क्रियाएं जैसे मेहमानों के आने पर लड़कियों द्वारा खाना परोसना, कमरे के भीतर रहना आदि भी आगे चलकर चुनौतियां बन जाती है। लड़कियों को बचपन में ही समझा दिया जाता है कि घर का कामकाज ही उनका भविष्य है। इसी तरह लड़कों के मन में यह विचारधारा बना दी जाती है कि आने वाले वक्त में वह घर के मुखिया होंगे और उन्हें पूरे परिवार का पालन-पोषण करना होगा। इन सभी धारणाओं के कारण बच्चे एक दूसरे को ही भेदभाव की नजर से देखने व स्वीकारने लगते हैं।

( मेरे अनुभव में सैनेटरी पैड्स वितरण हेतु जब मैं एक बस्ती पहुँची तो वहां 6 साल की बच्ची को बर्तन साफ करते हुए देखा। मैंने उससे पूछा कि आज तुम क्लास नहीं गई? उसने उत्तर दिया कि घर पर कोई नहीं है इसलिए काम करने रुकना पड़ा, पर भैया पढ़ने गया है और खेल कर घर लौटेगा। मैंने पूछा ऐसा क्यों? तो उसका जवाब था “क्योंकि वह लड़का जात है!”)

शैक्षिक आधार पर भेदभाव-

जहां लड़कों के लिए पढ़ाई को प्राथमिक महत्व दिया जाता है, वहां लड़कियों के लिए आज भी पढ़ाई को द्वितीयक समझा जाता है। सामाजिक माहौल में लड़के उच्च शिक्षा हेतु बाहर पढ़ने जा सकते हैं परंतु लड़कियों को बाहर भेजने से परहेज़ किया जाता है। विषयों की बात करें तो आज भी विज्ञान में लड़कियां बहुत पीछे हैं क्योंकि उन्हें मनपसंद विषयों का चयन करने की स्वीकृति प्राप्त नहीं होती है।

शारीरिक आधार पर भेदभाव-

किशोरावस्था में आते ही माहवारी को केंद्रित करते हुए लड़कियों को पक्षपात पूर्ण तरीके से घर में ही निचला दर्जा दे दिया जाता है। उनकी सबसे बड़ी शक्ति (मातृशक्ति) को ही अशुद्ध और कमज़ोर ठहरा दिया जाता है। उन्हें मासिक धर्म से जुड़े न जाने कितने मिथ्यों से जूझना पड़ता है। इसके कारण लड़के कई मामलों में लड़कियों को गलत नज़रिए से देखने लग जाते हैं, जो भविष्य में लैंगिक भेदभाव को और बढ़ावा देता है।

वैसे तो उपरोक्त सूचि अनगिनत है; लेकिन जो पितृसत्तात्मक, रुढ़िवादी और लिंग असमान सोच सदियों से बच्चों पर प्रभाव डाल कर उनके भविष्य की विचारधारा को ठोस बना रही है, उस पर आज ध्यान देकर बदलाव लाना अति आवश्यक है।

! लेखिका – आयुषी गोस्वामी !